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भ्रमित करता धर्मतन्त्र

Posted On: 27 Aug, 2013 Others,social issues,कविता में

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भ्रमित करता धर्मतन्त्र

प्रपंची प्रवचनोंसे, करते शोषण जन जन का।
वैभव में रह कर, देते उपदेश सादगी का।।
धर्मतन्त्र के दिग्गज,बजाते अपनी ढफली अपना राग।
देश की युवा शक्ति, ठोकर खाती रही भटक।
भोग विलासी शोषक,जनता में रहा खटक।।
धर्मतन्त्र के दिग्गज,बजाते अपनी ढफली अपना राग।
धर्मतन्त्र-शोषक सो रहा यौवन की गलियों में।
बचा समय कुछ, सो गये अकूत सम्पदा के ढेरों में।।
धर्मतन्त्र के दिग्गज, बजाते अपनी ढफली अपना राग।

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bdsingh के द्वारा
August 29, 2013

आपको बहुत बहुत धन्यवाद

    bdsingh के द्वारा
    September 16, 2013

    आपके लेख से समाजिक कण्ट उजागर होते हैं।लेख पर प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद।

harirawat के द्वारा
August 29, 2013

HAPPY JANMAASHTMI !

    bdsingh के द्वारा
    September 16, 2013

    आप की बधाई मिली जिससे मन को बहुत खुशी मिली। विलम्ब के लिए खेद है।


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