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क्या हिन्दी भाषा गरीबों और अनपढ़ों की भाषा बन कर रह गयी है

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क्या हिन्दी भाषा गरीबों और अनपढ़ों की भाषा बन कर रह गयी है,
हिन्दी भाषा अपने उद्गम समय से आज तक अनेक सुगम-दुर्गम मार्ग तय किया है। हन्दी को त निरन्तर बहते जाना है। परिवर्तनशीलता एवंगति में ही इसका जीवन है। इसे जन-जन के साथ बढ़ते जाना है।
अब प्रश्न है कि- क्या हिन्दी गरीबो ,अनपढ़ो की भाषा बन कर रह गयी है,अर्थात क्या अंग्रेजी अमीरों और हिन्दी गरीबों,अनपढ़ों की भाषा बन गयी है, इसके उत्तर में यह कहना कि जो संबन्ध संस्कृत
और भारती भाषा (हिन्दी) में था,वही संबन्ध आज अंग्रेजी और भारतीभाषा (हिन्दी)में है। यह कहना तर्क-
संगत लगता है।
उच्चारण की दृण्टि से संस्कृत कठिन थी एवं उसमें तरलता का अभाव होने के कारण आम जन
इसका प्रयोग इसका प्रयोग नहीं करती थी। सामान्य जन में जो भाषा बोली जाती थी,वह भारती भाषा थी।
जिसको बाहरी प्रभाव से हिन्दी कहा जाने लगा। बोल-चाल की हिन्दी भाषा, वैदिक कर्मकाण्डों की संस्कृत
भाषा के समानान्तर थी। हिन्दी को संस्कृत से उत्पन्न कहा जाता है। हिन्दी ने प्रारम्भ से ही अन्य भाषाओं
जैसे-सस्कृत, अरबी, फारसी,उर्दू,अंग्रजी क शब्दों को आत्मसात किया है। हि्न्दी ने सबसे अधिक शब्द
संस्कृत भाषा के अपनाये हैं। शायद इसी कारण से कहा जाता है कि हिन्दी भाषा की उत्पत्ति संस्कृत भाषा
से हुई है।
संस्कृत वैदिक कर्मकाण्ड की भाषा थी। सामान्य जन की भाषा हिन्दी थी। इसी प्रकार आधुनिक काल
में सामान्य जन की भाषा हिन्दी है। एक वर्ग विशेष की भाषा अंग्रेजी है। पुनः प्रश्न है कि क्या हिन्दी गरी-
बों व अनपढ़ों की भाषा बन कर रह गयी है। इसके लिए प्रथम प्रयोग को आधार मान कर, व्दितीय
अध्ययन को आधार मान कर विचार किया जा सकता है। प्राचीन,मध्य एवं आधुनिक काल में हिन्दी
सामान् जन की भाषा थी और है। अंग्रेजी भाषा सामान्य जन की भाषा नहीं है। बोल- चाल (प्रयोग) के
आधार पर हिन्दी का प्रयोग गरीब और अमीर सभी करते हैं। हिन्दी बोलने वालों की संख्या सर्वाधिक है।
पूर्णतः अंग्रेजी बलने वालों की संख्या अतिन्यून है। अर्थात सभी अमीर लोग और उनकी संतानें पूर्णः अंग्रेजी
नहीं बोलती है। लेकिन गरीब और अनपढ़ व्यक्ति अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी भाँति प्रयोग करता है।
अविरल बहती हिन्दी धारा
अपनी गति से बहती हिन्दी धारा।
जैसे बहती अविरल गंगा धारा ।।
आर्यावर्त से निकली हिन्दी भाषा।
सुगम-दुर्गम पथ तय करती यह भाषा।
नगर-गाँव कहती जाती हिन्दी भाषा।
मैं हूँ सरल सुरीली आपकी भाषा।।
मैं साथ निभाती जाती सबका।
फिर क्यों साथ न पाऊँ अपनों का।।
जितना भी चाहो,जाओ मुझसे दूर।
लौटोगे, रह न पाओगे मुझसे दूर।।
इसी लिए कवि कहता है—
जन-जन के मन की बात करो।
अपनी हिन्दी का तुम सम्मान करो।।
अध्ययन को आधार बनाया जाय तो कमोवेश यह कहा जा सकता है कि हिन्दी गरीब की भषा है। माध्यमिक
शिक्षा हिन्दी की अपेक्षा अंग्रेजी माध्यम की पढ़ाई मंहगी है। व्यवसाय,सामाजिक सम्पर्क एवं दैनिक जीवन में गरीब , अनपढ़ व्यक्ति भी अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करता है। यह स्थिति अमीर व शिक्षित के साथ भी है। वह अंग्रेजी जानते हुए भी पूर्णतः अंग्रेजी नही बोलता। इस प्रकार कह सकत हैं की हिन्दी अमीर-गरीब व शिक्षित-अशिक्षित सभी की भाषा है।

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

bdsingh के द्वारा
October 18, 2013

यह लेख एवं कविता दैनिक जागरण समाचार पत्र में दिनांक 27-9-13 को प्रकाशित हुई,धन्यवाद।

    bdsingh के द्वारा
    October 18, 2013

    लेखन के लिए प्रोत्साहित करने के लिए धन्यवाद।

nishamittal के द्वारा
October 11, 2013

हिंदी के महत्व को दर्शाती रचना के साथ सुन्दर पोस्ट पर बधाई आपको

    bdsingh के द्वारा
    October 11, 2013

    आपका आभार। बधाई पर आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।


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