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धर्म में शोषण दोषी स्वघोषित धर्म परायण या श्रद्धालु

Posted On: 26 Nov, 2013 Others,social issues,Junction Forum,Hindi Sahitya में

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धर्म में शोषण दोषी स्वघोषित धर्म परायण या श्रद्धालु
स्वघोषित धर्म परायण धार्मिक सेवा की ओट में श्रद्धालु का शोषण करता है। उसको सम्पूर्ण धन दान करने के लिए प्रेरित करता है। महिला श्रद्धालु के साथ दुष्कृत्य करता है। प्रश्न उठता है कि इसके लिए दोषी कौन है,
भक्त या संत। इसके लिए सर्वप्रथम धर्म, धर्मपरायण व श्रद्धा को समझना आवश्यक है। अलौकिक शक्ति के होने का विश्वास, उसकी उपासना करना, अपने आदर्श को पवित्र मानना और दुःख से मुक्ति मिलने का आश्वासन। धर्मपरायणता का आशय समर्पण की भावना के साथ स्वयं और मानव कल्याण के लिए धार्मिक सेवा करना है। श्रद्धा का अर्थ है अपने अराध्य पर पूर्ण विश्वास। श्रद्धा मनुष्य को शक्ति प्रदान करती है।
धर्म मनुष्य को भयमुक्त करके प्रेम की भावना जागृत करता है। धर्म-सेवक मानव कल्याण के लिए धार्मिक प्रवचन करता है। त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत कर माया मोह से दूर रहने की बात करता है।
लेकिन विशेष बात यह है कि धर्म-सेवक क्या वास्तविक रूप मे धर्म की सेवा करता है, वास्तविक रूप में प्रायः सभी धर्म- गुरू विलासिता पूर्ण जीवन जीते हैं। अपने प्रपंची प्रवचनों के माध्यम से लुभावने व भयग्रस्त करने वाली बातों से जनता को गुमराह करके उसका धन लूट लेते हैं। धर्म-सेवक अकूत धन लूट कर स्वयंभू भगवान बन बैठता है। यह धर्म-सेवा नहीं स्पष्ट रूप से छल है।
लाखों अंधविश्वासी जनता उनके जाल में फंस कर अपना सब कुछ गवाँ कर जीवन बदतर कर लेते है।
अपने कठिन परिश्रम की कमाई को गवाँ कर, अतार्किक बातों मानकर अल्प ज्ञानी होने का परिचय देताहै।
दूसरी तरफ वह अकर्मण्य मानव विलासिता की चरम सीमा तक पहुँचने में लगा रहता है। यह धर्म नहीं आपराधिक दुकानदारी है। सच्चा ई्श्वर प्रेम कुछ मांगता नहीं है। जीवन के समस्त अवगुणों से खुद को बचाने के लिए ईश्वर की उपसना रता है।
सच्ची श्रद्धा और अंधविश्वास में बहुत अंतर है। अंधविश्वास में अविवेक छाया रता है। ऐसी स्थिति में उचित और अनुचित के विश्लेषण का समय नहीं होता है। इसी लिए ठग अज्ञानियों को अपने चंगुल में फंसा लेते है।
अब प्रश्न उठता है कि इसके लिए दोषी कौन है, स्वघोषित धर्मपराण या श्रद्धालु। बात स्पष्ट है कि छल,कपट या ठगी करने की छूट किसी को भी नहीं दी जा सकती है।

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

dineshaastik के द्वारा
November 27, 2013

आदरणीय.  सिंह साहब, धर्म का निर्माण निर्बलों, निर्धनों आदि  का शोषण करने के लिये ही हुआ था। प्रजा मूर्ख थी औ अज्ञानी। वो असभ्य थी औ अभिमानी।। बंधन को थी नहीं मानती। न ही नियमों को वो जानती।। एक व्यक्ति था शक्तिशाली। सत्ता उसने वहाँ बना ली।। राजा बना बड़ा था ज्ञानी। नियम बनाने की कुछ ठानी।। विद्वानों को उसने ढूढ़ा। संविधान फिर बना था पूरा।। बने वही उसके दरवारी। बने बाद में धर्माधिकारी।। मान न उसको रही प्रजा थी। राजा ने फिर उन्हें सजा दी।। उनपर कुछ न असर पड़ा था। राजा चिंचित हुआ बड़ा था।। उसने विद्वानों से पूछा। उनको इक उपाय था सूझा।। ईश्वर फिर था एक रचाया। संविधान को धर्म बनाया।। कल्पित उसमें शक्ति सारी। लालच दिया डराया भारी।। स्वर्ग का लालच उन्हें दिखाया। और नर्क से उन्हें डराया।। ईश्वर के ये नियम हैं सारे। हम सब उसके बेटे प्यारे।। जो माने न उसका कहना। उसे नर्क में पड़ेगा रहना।। जो मानेगा उसकी बातें। उसके लिये स्वर्ग सौगातें।। डरे बहुत औ लालच जागा। ईश्वर से डर सबको लागा।। ऐसे बना धर्म औ ईश्वर। राजा बना ईश पैगम्बर।। राज्य के जो मंत्री अधिकारी। बना दिया धर्माधिकारी।। हुआ प्रजा का तब से शोषण। हुआ बाहुबलियों का पोषण।। धर्म ईश ने हमें ठगा जो। वही लिखा, सच मुझे लगा जो।।

    bdsingh के द्वारा
    November 27, 2013

    आपकी प्रतिक्रिया पढ़ी। आपको बहुत-बहत धन्यवाद। मैं आपके विचार काव्य के रूप में बहुत बड़ा दर्शन समाहित है।


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