Samajik Vedna

Just another weblog

30 Posts

69 comments

bdsingh


Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

Sort by:

धर्म जीत और जीवन

Posted On: 27 Aug, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others social issues कविता में

2 Comments

गरीब का दर्द

Posted On: 21 Aug, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (7 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Junction Forum Others social issues कविता में

2 Comments

उत्सव

Posted On: 21 Aug, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (7 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others social issues कविता में

2 Comments

दुश्कृत्य एक भयावह समस्या

Posted On: 7 Aug, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Junction Forum Others social issues कविता में

0 Comment

कनक सी कनपुरिया

Posted On: 2 Aug, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others social issues कविता में

1 Comment

कन्या की व्यथा

Posted On: 2 Aug, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others social issues कविता में

2 Comments

घर आई लली

Posted On: 5 Jul, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others social issues कविता में

1 Comment

नारी के रूप अनेक

Posted On: 5 Jul, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (5 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others Others social issues कविता में

0 Comment

मानव धर्म

Posted On: 28 Jun, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others social issues कविता में

0 Comment

मां-बाप की व्यथा

Posted On: 27 Jun, 2013  
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (8 votes, average: 4.88 out of 5)
Loading ... Loading ...

Others social issues कविता में

0 Comment

Page 3 of 3«123

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Rajesh Kumar Srivastav Rajesh Kumar Srivastav

के द्वारा: bdsingh bdsingh

आदरणीय.  सिंह साहब, धर्म का निर्माण निर्बलों, निर्धनों आदि  का शोषण करने के लिये ही हुआ था। प्रजा मूर्ख थी औ अज्ञानी। वो असभ्य थी औ अभिमानी।। बंधन को थी नहीं मानती। न ही नियमों को वो जानती।। एक व्यक्ति था शक्तिशाली। सत्ता उसने वहाँ बना ली।। राजा बना बड़ा था ज्ञानी। नियम बनाने की कुछ ठानी।। विद्वानों को उसने ढूढ़ा। संविधान फिर बना था पूरा।। बने वही उसके दरवारी। बने बाद में धर्माधिकारी।। मान न उसको रही प्रजा थी। राजा ने फिर उन्हें सजा दी।। उनपर कुछ न असर पड़ा था। राजा चिंचित हुआ बड़ा था।। उसने विद्वानों से पूछा। उनको इक उपाय था सूझा।। ईश्वर फिर था एक रचाया। संविधान को धर्म बनाया।। कल्पित उसमें शक्ति सारी। लालच दिया डराया भारी।। स्वर्ग का लालच उन्हें दिखाया। और नर्क से उन्हें डराया।। ईश्वर के ये नियम हैं सारे। हम सब उसके बेटे प्यारे।। जो माने न उसका कहना। उसे नर्क में पड़ेगा रहना।। जो मानेगा उसकी बातें। उसके लिये स्वर्ग सौगातें।। डरे बहुत औ लालच जागा। ईश्वर से डर सबको लागा।। ऐसे बना धर्म औ ईश्वर। राजा बना ईश पैगम्बर।। राज्य के जो मंत्री अधिकारी। बना दिया धर्माधिकारी।। हुआ प्रजा का तब से शोषण। हुआ बाहुबलियों का पोषण।। धर्म ईश ने हमें ठगा जो। वही लिखा, सच मुझे लगा जो।।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: deepakbijnory deepakbijnory

के द्वारा: bdsingh bdsingh

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

के द्वारा: DR. SHIKHA KAUSHIK DR. SHIKHA KAUSHIK

के द्वारा: nishamittal nishamittal

भारत देश की एक अपनी विशेष संस्कृति रही है। यदि युवकों और युवतियों को झूठी आधुनिता के लिए स्वच्छन्द रखा गया तो समाज का वह विकृत रूप तैयार होगा, जिस पर एक सभ्य समाज की कल्पना नहीं की जा सकती। देश की संस्कृति आँसू बहायेगी। पाश्चात्य सभ्यता की अंधी नकल ठीक नहीं है। नारी समाज की जननी है। स्वस्थ्य समाज के लिए नारी का सम्मान आवश्यक है। इसके लिए—– स्वस्थ्य,सुन्दर,पढ़ी-लिखी हो हमार जननी, को आधार बनाया जाय। तभी समाज का कल्याण होगा। स्वस्थ समाज की स्थापना हो सकेगी। ********************************************** महोदय आपने मेरे ब्लाग पर आकर जो मेरा हौसला बढाया है , उसके लिए बहुत – बहुत धन्यावाद । महोदय आपकी बातों से शतप्रतिशत सहमत हूं, आपने जो बाते कही हैं वह बाते हमारे उच्च पदो पर आसिन , नेता , अमले , चम्मरचे करना तो दूर कह तक नहीं कर पाते । पुरूष फुल शर्ट और पैंट तो नारियां अंग प्रदर्शन कर रही है । यह सही है उन देशों में जहां इनका चलन है । जहां ‘डेटिंग’ जैसे रिवाज हैं । परंतु हमारे देश में आजादी के नाम पर , स्वदछंदता के नाम पर अपनी संस्कृति को ताख पर रख कर , ऑउट डेटेड कह कर पश्चिमी देशों का अंधानुकरण किया जा रहा है । मेरा मानना है यही सारी समस्याओं की जड़ है । पूजा, आत्म – चिंतन , प्रार्थना अब स्कुलों के पाठ्क्रम में नहीं हैं , अंग्रेजी के अगर चार शब्दों को बच्चा बोल लेता है तो हम गदगद हो जाते हैं । यह रिवाज भी हमारे यहां नही होनी चाहिए । बाजारवाद की दुनिया में आदमी का अर्थ सिर्फ अर्थ प्राप्त करना रह गया है । आदमी इसके लिए सारी आदमियत को त्याग कर नंगा मशीन बन गया है जो अर्थ पैदा करने का जरिया मात्र है । अत: नैतिक पतन हो गया है । इंसानियत का लोप हो गया है । ईश्वर के प्रति जो भय था वह समाप्ता हो गया है । इंसान स्वंय को भगवान मानने लगा है । तुलसी दास ने ठीक ही कहा है- ‘भय बिन होउ न प्रीत’

के द्वारा: udayraj udayraj

के द्वारा: harirawat harirawat

के द्वारा: Rajesh Kumar Srivastav Rajesh Kumar Srivastav




latest from jagran